अध्याय 1 – अर्जुन विषाद योग
संस्कृत श्लोक
सञ्जय उवाच।
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥ २॥
हिंदी अर्थ
संजय बोले – हे धृतराष्ट्र! उस समय राजा दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को युद्ध के लिए व्यूह रचना में खड़ा देखकर अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर ये वचन कहे।
सरल भाषा में भावार्थ
जब दुर्योधन ने युद्धभूमि में पाण्डवों की विशाल और व्यवस्थित सेना को देखा, तो वह अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास गया और उनसे बात करने लगा।
इस श्लोक से हमें यह समझ आता है कि युद्ध शुरू होने से पहले ही दुर्योधन पाण्डवों की सेना को देखकर चिंतित और सतर्क हो गया था।
शब्दार्थ
- दृष्ट्वा – देखकर
- पाण्डवानीकम् – पाण्डवों की सेना
- व्यूढम् – युद्ध के लिए सजाई हुई
- आचार्यम् – गुरु द्रोणाचार्य
- उपसङ्गम्य – पास जाकर
- राजा – राजा दुर्योधन
- वचनम् – वचन या बात
- अब्रवीत् – कहा
शिक्षा: किसी भी कठिन परिस्थिति में व्यक्ति के मन की स्थिति उसके व्यवहार और निर्णयों में दिखाई देती है।

DISCLAIMER | अस्वीकरण
यह पोस्ट श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों, उनके हिंदी अर्थ एवं सरल भावार्थ को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से तैयार की गई है।
इसमें दी गई व्याख्या केवल धार्मिक, आध्यात्मिक एवं शैक्षिक जानकारी के लिए है। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, जाति, समुदाय या व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः। 🙏